पशुओं की संक्रामक एवं छूत वाली बीमारियां एवं उनकी रोकथाम

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पशुओं की संक्रामक एवं छूत वाली बीमारियां एवं उनकी रोकथाम

डॉ संजय कुमार मिश्र1एवं डॉ मुकेश कुमार श्रीवास्तव2
1.पशु चिकित्सा अधिकारी चोमूहां मथुरा
2. सहायक आचार्य एवं प्रभारी पशु औषधि विज्ञान विभाग दुवासु मथुरा उत्तर प्रदेश

सामान्यता बीमारियों को मुख्यत: तीन भागों में बांटा जा सकता है-

1. संक्रामक बीमारियां
2. छूत वाली बीमारियां
3. असंक्रामक बीमारियां
संक्रामक बीमारियां:
यह वह बीमारियां होती हैं जोकि सूक्ष्मजीवों द्वारा होती हैं परंतु इन सूक्ष्मजीवों की शरीर में उपस्थिति के कारण यह संक्रमण नहीं फैलाती हैं।

छूत वाली बीमारियां:
यह वह बीमारियां हैं जो जीवाणु एवं विषाणु से उत्पन्न होती हैं और यह जीवाणु और विषाणु एक पशु से दूसरे पशु तक बड़े आसानी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पहुंच जाते हैं। कभी-कभी छूत एवं संक्रामक दोनों का अर्थ एक सा नजर आता है, । छूत की बीमारी के कारण को बताती है जबकि संक्रमण यह बताता है की एक बीमारी एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुंचती हैं। सभी छूत की बीमारियां संक्रामक होती हैं परंतु सभी संक्रामक बीमारियां छूत वाली नहीं होती हैं।
पशुओं में पाई जाने वाली छूत की बीमारियां क्षय रोग, जॉनी रोग, गलेंडर एवं फारसी रोग, माल्टा फीवर या ब्रूसेलोसिस जीवाणु जनित एवं, रेबीज या हाइड्रोफोबिया विषाणु जनित रोग है।

असंक्रामक रोग:
वह रोग हैं जोकि घाव, सर्दी गर्मी , खराब भोजन, असामान्य शरीर क्रिया विज्ञान या असामान्य ऊतक वृद्धि के कारण होती हैं। इनके उदाहरण इस प्रकार हैं मधुमेह एवं विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियां जैसे रिकेट्स खनिज तत्व की कमी से होने वाली बीमारियां जैसे ब्याने के बाद हिमोग्लोबिनुरिया इत्यादि।

रोगों के कारण एवं फैलाव की विधि:
यह बीमारियां जीवाणु, विषाणु अथवा प्रोटोजोआ के कारण होती हैं।

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संक्रमण के कारण:
पोषिता अर्थात होस्ट के कारण अधिकतर इसका संक्रमण होता है जोकि अप्रत्यक्ष या बहुत अधिक जटिल होता है। होस्ट के द्वारा संक्रमण निम्न प्रकार से होता है-
१. एक बीमारी वाले पशु का संपर्क बिना बीमारी वाली पशु के साथ होने पर इस प्रकार का रोग फैलता है। जैसे रिंगवर्म या दाद एवं अन्य चर्म रोग पशु के प्रजनन अंग को चाटने से ब्रूसेलोसिस नामक बीमारी होती है जब पशु संभोग करता है तो उस समय यह बीमारी मादा में स्थानांतरित हो जाती है।
२. संक्रमणीय पदार्थ के संपर्क द्वारा:
एक पशु से दूसरे पशु में यह बीमारी फैलती है जबकि एक गाय के गर्भपात के द्वारा सूखा या गीला स्राव दूसरी गायों को लगता है।
३. रोग ग्रस्त वस्तुओं के संपर्क द्वारा:
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीमारी एक पशु द्वारा दूसरे पशुओं में जाती है।
४. मिट्टी द्वारा रोग:
कुछ जीवाणु जो की बीजाणु बनाते हैं तथा मिट्टी में जीवित रह सकते हैं पशु तथा मनुष्यों में पहुंचकर बीमारी उत्पन्न करते हैं। यह जीवाणु खाल के कटे हुए भाग से शरीर में पहुंच जाते हैं। इनके द्वारा मुख्यता फैलने वाली बीमारी टिटनेस तथा ब्लैकलेग इत्यादि है।
५. हवा द्वारा रोग:
वायु के द्वारा अधिकतर पशुओं में वे लोग फैलते हैं जो कि विषाणु के द्वारा होते हैं जैसे खुर पका मुंह पका। यह बीमारी विषाणु के द्वारा 100 मीटर की दूरी तक भी हो सकती है।
६.भोजन व जल द्वारा:
जल तथा भोजन के द्वारा पशुओं की अपेक्षा मनुष्यों में अधिक बीमारियां फैलती हैं। पशुओं में फैलने वाली बीमारियां एंथ्रेक्स तथा जॉनीज डिसीज होती हैं।
. रक्त चूसने वाले कीटों द्वारा रोग:
पशु तथा मनुष्यों को बीमारियां मक्खियों, मच्छरों जूं ,के काटने तथा कलीली द्वारा रक्त चूसने से होती है। इनके मुख्य उदाहरण मलेरिया, डेंगू, पीला बुखार एवं जापानी इंसेफलाइटिस आदि मनुष्य में होती हैं। पशुओं में एंथ्रेक्स बीमारी भी इससे फैल सकती है।
कुछ जीवाणु एक पशु से दूसरे पशु में पहुंचकर बीमारी फैलाते हैं। यह जीवाणु स्ट्रैप्टॉकोक्कस, न्यूमोकोकस एवं पाश्चुरेला इत्यादि है।

बचाव एवं रोकथाम:
१. पशुओं को अलग करना:
पशुओं के पूरे झुंड को तीन भागों में बांटा जाता है नंबर 1 प्रभावित नंबर दो अप्रभावित नंबर 3 सस्पेक्टेड या संभावित। पशुओं को उनके गुणों के अनुसार कि वह किस वर्ग में आते हैं उनका उपचार किया जाता है।
२. संगरोध या क्वॉरेंटाइन: संदेहात्मक पशु को लगभग 40 दिन के लिए अलग रखा जाता है जबकि यह भय होता है कि उन पशुओं के द्वारा कोई छूत वाली बीमारी फ़ैल है। जिससे इनके द्वारा लगने वाली बीमारी का ज्ञान हो सके। जब यह पशु ठीक हो जाते हैं तो उन्हें स्वस्थ पशु के साथ मिलाया जाता है।
३. रोग की सूचना:
जब कोई बीमारी फैल जाए तो इसकी सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को तुरंत देनी चाहिए।
४. मरे, रोगी पशु तथा उनके बिछावन को दूर करना:
पशुओं के मृत शरीर तथा बिछावन को जिनमें बीमारी के जीवाणु हो जला देना चाहिए अथवा गहरा गड्ढा खोदकर इन्हें चूने की मोटी परत के साथ दबा देना चाहिए।
५. पशुओं के स्थान को जीवाणु रहित करना:
जहां पशु बांधे जाते हैं वहां की दीवारों तथा फर्श को 3% वाले लाई के गर्म जलीय घोल द्वारा अच्छी प्रकार से रगड़ कर धो देना चाहिए और फिर क्रिसोल या फिनाइल के 5% घोल से इन दीवारों की सफेदी कर देनी चाहिए तथा सफेदी के लिए, ढाई सौ ग्राम चुना को 5 लीटर पानी एवं कार्बोलिक एसिड में मिलाना चाहिए। अथवा 225 ग्राम सोडियम हाइड्रोक्साइड को 23 लीटर पानी में मिलाकर जीवाणु रहित करने के लिए प्रयोग में लिया जा सकता है। 4 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट के घोल को भी प्रयोग में ला सकते हैं। 3%
फॉर्मएल्डिहाइड के घोल को भी प्रयोग में ला सकते हैं। अथवा तीन से 5% वाले ब्लीचिंग पाउडर के घोल को भी प्रयोग में लाते हैं।
६. पशुओं का टीकाकरण कराना:
सभी स्वस्थ पशुओं को बीमार पशुओं से बचाने के लिए यह आवश्यक है की बीमारी के अनुसार उचित समय पर पशुओं को जीवाणु एवं विषाणु से होने वाली बीमारियों का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
७. प्रारंभिक रोग निदान:
यदि प्रारंभ में पशुओं की बीमारी का ज्ञान हो जाएं तो उन्हें शीघ्रता से रोका जा सकता है। सभी पशुओं के रक्त का परीक्षण कराना चाहिए जिन्हें लगातार 24 घंटे से अधिक समय तक बुखार रहता हो।
८.चारागाहों का बदलना:
जब कभी कोई भी छूत वाली बीमारी फैलती हुई नजर आए तो तुरंत ही पशुओं के लिए चरागाह बदल देना चाहिए। पशुओं को अन्य दूसरे चरागाह या खाली खेत में चरने के लिए भेजना चाहिए।

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